Monday, July 22, 2019

शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


26 जनवरी 1950 को भारत के प्रथम गणतंत्र की संध्या पर शहनाई से राग काफी में उभरी स्वर लहरियों ने संपूर्ण वातावरण में जैसे सुरों की गंगा प्रवाहित कर दी थी। इस दिवस का हर्षोल्लास दुगना हो गया था। श्रोता भावविभोर होकर स्वरों की अपूर्व बाजीगरी का आनंद उठा रहे थे और मन ही मन प्रशंसा कर रहे थे उस कलाकार की, जो शहनाई से उभरे स्वरों के रास्ते उनके ह्रदयों में प्रवेश कर रहा था
शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ

यह शहनाई वादक थे बिस्मिल्लाह खाँ जो स्वतंत्र भारत की प्रथम गणतंत्र दिवस की संध्या पर लाल किले में आयोजित समारोह में शहनाई बजा रहे थे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां एक ऐसे कोमल ह्रदय व्यक्ति थे जो संगीत के द्वारा आत्मा की गहराइयों में उतर जाते थे। ऐसा व्यक्तित्व जो विश्वविख्यात शहनाई वादक के रूप में जीते जी किंबंदती बन गए

बिस्मिल्लाह खां का जन्म 21 मार्च 1916 को डुमराव, बिहार में हुआ था। इनके पूर्वज डुमराव रियासत में दरबारी संगीतज्ञ थे। इन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा चाचा अलीबख्श विलायत से मिली। अलीबख्श वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। चाचा की शिक्षा से जहां उनमें संगीत के प्रति गहरी समझ विकसित हुई वहीं सभी धर्मों के प्रति आदर का भाव भी जागृत हुआ। उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया और शहनाई वादन को विश्व स्तर पर नित नई ऊंचाइयां देने का निश्चय कर लिया

बिस्मिल्लाह खां संगीत, सुर और पूजा को एक ही दृष्टि से देखते थे। उनका मानना था कि संगीत, सुर और पूजा एक ही चीज है। बिस्मिल्लाह खाँ ने अपनी शहनाई की गूंज से अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान,इराक, कनाडा, अफ्रीका, रूस, अमेरिका, जापान और हांगकांग समेत विश्व के सभी प्रमुख देशों के श्रोताओं को रसमग्न किया। उनका संगीत समुद्र की तरह विराट है लेकिन मैं विनम्रता पूर्वक कहते थे, मैं अभी मुश्किल से इसके किनारे तक ही पहुंच पाया हूं मेरी खोज अभी जारी है

संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ को देश-विदेश में विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सन 2000 में प्रदान किया गया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन पुरस्कार, मध्य प्रदेश राज्य पुरस्कार, पद्म भूषण जैसे सम्मान एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें प्रदान की गई डॉक्टरेट की उपाधि उनकी ख्याति की परिचायक हैं

शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
शहनाई का जादूगर-उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ

खाँ साहब अत्यंत विनम्र, मिलनसार और उदार व्यक्तित्व के धनी थे। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण, कड़ी मेहनत, घंटों अभ्यास, संतुलित आहार, संयमित जीवन और देश प्रेम के अटूट भाव एवं गुणों ने उन्हें विश्व स्तर पर ख्याति दी। अभिमान तो जैसे उन्हें छू तक नहीं पाया था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ शास्त्रीय संगीत परंपरा की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी थे जिन पर प्रत्येक देशवासी को गर्व है

21 अगस्त सन 2006 को वाराणसी में ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने अपनी अंतिम सांस ली, वह 90 वर्ष के थे। तिरंगे में लिपटे बिस्मिल्लाह खाँ के पार्थिव शरीर की बेनीबाग से शुरू हुई शव यात्रा के दौरान लाखों लोगों की भीड़ से रास्ता जाम हो गया। जब उस्ताद का जनाजा करबला पहुंचा तो उन्हें आंसुओं का नजराना देने वालों की लंबी-लंबी कतारें लग गई। इस दौरान हल्की बारिश होने से यह एहसास हुआ मानो प्रकृति भी उस्ताद के दुनिया से विदा होने पर आंसू बहा रही है। शास्त्रीय संगीत की दुनिया में वेएक रत्न की तरह रहेंगे। उनकी कला सर्वदा सभी के दिलों में सम्मान पाती रहेगी

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